सुनत सकल मुद मंगल देनी संत समाज की त्रिवेणी देती है भक्तों को आनंद और मंगल

Motivational Quotes, Chaupai, Ramcharitmanas: रामचरितमानस के बालकाण्ड में तुलसीदास जी ने वाणी विनायक, देवताओं और पंचदेवों की वंदना की. उसके पश्चात श्री गुरु वंदना की. आज हम लोग तुलसी बाबा के द्वारा विप्र वंदना के विषय को जानेंगे. विप्र पद यानी ब्राह्मण पद की वंदना करते हैं.

बंदउँ प्रथम महीसुर चरना ।
मोह जनित संसय सब हरना ।।
सुजन समाज सकल गुन खानी ।
करउँ प्रनाम सप्रेम सुबानी ।।

पहले पृथ्वी के देवता ब्राह्मणों के चरणों की वन्दना करता हूँ, जो अज्ञान से उत्पन्न सब संदेहों का समाधान करने वाले हैं. फिर सब गुणों के भण्डार संत-समाज को प्रेम पूर्वक सुन्दर वाणी से प्रणाम करता हूँ .

साधु चरित सुभ चरित कपासू।
निरस बिसद गुनमय फल जासू।।
जो सहि दुख परछिद्र दुरावा।
बंदनीय जेहिं जग जस पावा ।।

संतों का चरित्र कपास के चरित्र के समान शुभ है, जिसका फल नीरस, विशद और गुणमय होता है. जैसे कपास की डोडी नीरस होती है उसी प्रकार संत-चरित्र में भी विषयासक्ति नहीं है, इससे वह भी नीरस है; कपास उज्ज्वल व सफेद होता है, संत का हृदय भी अज्ञान और पाप रूपी अन्धकार से रहित होता है. इसी प्रकार संत का चरित्र भी सद्गुणों का भण्डार होता है, इसलिये वह गुणमय है. जैसे कपास का धागा सूई के किये हुए छेद को अपना तन देकर ढक देता है, अथवा कपास जैसे लोढ़े जाने, काते जाने और बुने जाने का कष्ट सहकर भी वस्त्र के रूप में परिणत होकर दूसरों के तन को ढकता है उसी प्रकार संत स्वयं दुःख सहकर दूसरों के दोषों को ढकता है, जिसके कारण उसने जगत्‌ में वन्दनीय यश प्राप्त किया है

⁠ मुद मंगलमय संत समाजू ।
जो जग जंगम तीरथराजू ।।
राम भक्ति जहँ सुरसरि धारा ।
सरसइ ब्रह्म बिचार प्रचारा ।।

संतों का समाज आनन्द और कल्याणमय है, जो जगत्‌ में चलता-फिरता तीर्थराज प्रयाग है. जहाँ उस संत समाज रूपी प्रयागराज में राम भक्ति रूपी गंगा जी की धारा है और ब्रह्मविचार का प्रचार सरस्वती जी हैं ⁠.

बिधि निषेधमय कलिमल हरनी ।
करम कथा रबिनंदनि बरनी ।।
हरि हर कथा बिराजति बेनी ।
सुनत सकल मुद मंगल देनी ।।

विधि अर्थात वेदों में जिन कर्मों को करने की आज्ञा है यानी ग्रहण करने लायक कर्म और निषेध जो प्रतिबंधित है, जिनकों त्यागना है. ऐसे कर्मों की कथा कलियुग के पापों को हरने वाली सूर्य की पुत्री यमुना जी हैं. भगवान विष्णु और शंकर जी की कथा रूपी भूमि में गंगा, यमुना और सरस्वती रूपी भक्ति त्रिवेणी का संगम है. जो सुनते ही सब आनन्द और मंगलों को देने वाली हैं⁠.

बटु बिस्वास अचल निज धरमा ।
तीरथराज समाज सुकरमा ।।
सबहि सुलभ सब दिन सब देसा ।
सेवत सादर समन कलेसा ।।

उस संत समाज रूपी प्रयाग में अपने धर्म में जो अटल विश्वास है वह अक्षयवट है, और शुभ कर्म ही उस तीर्थराज प्रयाग का समाज है. वह संत समाज रूपी प्रयाग राज सब देशों में, सब समय, सभी को, सहज ही प्राप्त हो सकता है और आदर पूर्वक ग्रहण करने से दुखों व संकटों को नष्ट करने वाला है.

अकथ अलौकिक तीरथराऊ।
देइ सद्य फल प्रगट प्रभाऊ।।

वह तीर्थराज अलौकिक यानि लोक से परे जिसकी तरह कोई वस्तु इस लोक में नहीं है और अकथनीय यानी जो कहा न जा सके. इसका प्रभाव प्रसिद्ध है कि यह तुरंत फल देता है.

दोहा—
सुनि समुझहिं जन मुदित मन मज्जहिं अति अनुराग ।
लहहिं चारि फल अछत तनु साधु समाज प्रयाग ।।2⁠।।

जो लोग इस संत-समाज रूपी तीर्थराज प्रयाग का प्रभाव प्रसन्न मन से सुनते और समझते हैं और फिर अत्यन्त प्रेमपूर्वक इसमें स्नान करते हैं. इस प्रयाग के स्नान की सुनना, समझना, आनंद तीन सीढ़ियां है. जो भक्त इनमें डुबकी लगाता है वह इस शरीर के रहते ही धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चारों फल पा जाता हैं.

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