साहित्यिक चोरी की कहानी में जानिए कौन हुआ पास और कौन फेल, हुमा कुरैशी पर भारी पड़ी भाग्यश्री की

Mithya Web Series Review: अंग्रेजी का एक शब्द है, प्लेजरिज्म. इसका अर्थ है, साहित्यिक चोरी. जी5 पर रिलीज हुई वेब सीरीज मिथ्या को देखने से पहले प्लेजरिज्म का मतलब जानना इसलिए जरूरी है कि कहानी की शुरुआत यहीं से होती है और इसकी कहीं व्याख्या नहीं की गई है. कॉलेज में पढ़ने वाली फर्स्ट ईयर की छात्रा रिया राजगुरु (अवंतिका दसानी) पर उसकी हिंदी की प्रोफेसर जूही अधिकारी (Huma Qureshi) आरोप लगाती है कि उसने सत्य और तथ्य विषय पर जो निबंध लिखा है, वह चोरी का है. रिया इससे इंकार करती है और यहीं से दोनों के बीच तनाव पैदा होता है। जो बढ़ते-बढ़ते उनकी निजी जिंदगियों में खलल पैदा करता है और मामला एक कत्ल तक जा पहुंचता है. सवाल यह कि किसने किया कत्ल और क्यों किया। इसका प्लेजरिज्म से क्या संबंध है। कौन किसको फंसा रहा है.

मिथ्या एक थ्रिलर है. नाम से लगता है कि शायद इसमें कोई जीवन दर्शन छुपा होगा, मगर ऐसा कुछ नहीं है. यह एक सपाट कहानी है, जो हैरान-परेशान किरदारों के साथ छह कड़ियों में फैली है. रिया की जिंदगी में बहुत सारी त्रासदियां एक साथ हैं तो जूही शराब-सिगरेट के साथ विवाह के कुछ वर्षों बाद भी प्रेग्नेंट न हो पाने की मुश्किल और तनाव से गुजर रही है. मामला आईवीएफ तक पहुंच गया है. रिया का प्रोफेसर पति नील (परमब्रत चक्रवर्ती) भी अपने करियर और जीवन में संतुलन बनाने की कोशिश में है. जबकि रिया के प्रोफेसर पिता (Rajit Kapoor) हैं, जिनकी जिंदगी वैसी नहीं है, जैसी ऊपर से नजर आती है. इन प्रमुख किरदारों के बीच मिथ्या गोल-गोल चक्कर लगाती हुई इस सवाल का जवाब ढूंढती है कि आखिर रिया और जूही के टकराव का अंत कैसे होगा. क्या यह छोटी-सी बात का बना बतंगड़ है या फिर कुछ और. क्या अवंतिका सच बोल रही है कि उसने कोई नकल नहीं की या फिर जूही उसे किसी और कारण से शिकार बना रही है.

मिथ्या 2019 में आई ब्रिटिश सीरीज चीट (छल) का हिंदी रूपांतरण है. अतः मौलिकता का संकट मिथ्या के किरदारों में देखने मिलता है. मुंबई की हाई-फाई लाइफ से बाहर न देख पाने वाले मेकर हिंदी की अध्यापिका की छवि यहां जैसी गढ़ते हैं, वह किसी के गले शायद ही उतरे. शराब की लत, हाथों में सिगरेट और विवाहेतर संबंध. मेकर्स को लगता है कि किरदार को सिर्फ साड़ी पहना देने से वह हिंदी की प्रोफेसर हो जाएगी.

हिंदी चूंकि यहां विषय के रूप में भी है तो इसकी क्लास में जिन मुद्दों पर चर्चा होती है, उन्हें देख कर नहीं लगता कि लेखकों ने किसी विश्वविद्यालय में हिंदी की कोई क्लास देखी भी है. हिंदी की कक्षा में होने वाली बातचीत बहुत बनावटी और स्तरहीन है. पूर्वा नरेश ने यहां संवाद लिखे हैं. अंग्रेजी में काम करने वाले मेकर्स ब्रिटिश सीरीज के इस रूपांतरण में अगर प्रोफेसर और क्लास भी इंग्लिश लिटरेचर के रख लेते, तब भी मिथ्या ज्यों की त्यों रहती. कम से कम माहौल, किरदार और भाषा में रवानी बनी रहती. साथ ही जिस स्लैंग और सेक्सटिंग का यहां निर्देशक रोहन सिप्पी ने एक एपिसोड में खुल कर इस्तेमाल किया है, वह पूरी सीरीज में सहजता से यह काम कर पाते.

मिथ्या का विषय किसी थ्रिलर फिल्म जैसा है, लेकिन इसे सीरीज के रूप में बनाया गया. कसावट के अभाव में चीजें बिखर गई हैं. कोई विषय किस माध्यम में बनाया जाना चाहिए, अगर इसे आप समझना चाहें तब भी मिथ्या देख सकते हैं. मिथ्या के साथ अच्छी बात यह है कि कमजोर स्क्रीनप्ले (एल्थिया कौशल और अन्विता दत्त) के साथ निर्देशक ने इसे लंबा नहीं खींचा. अतः अगर आपके पास फुर्सत है और खाली वक्त गुजारना है तो मिथ्या देख सकते हैं. हालांकि मिथ्या देखने की कोई खास वजह ढूंढी जाए तो वह है अवंतिका दसानी.

वह गुजरे जमाने की वन-फिल्म-वंडर अभिनेत्री भाग्यश्री की बेटी हैं और मिथ्या को अवंतिका के लिए याद रखा जा सकता है. यह उनका पहला काम है और वह प्रभाव छोड़ती हैं. शुरुआती दो एपिसोड के बाद अवंतिका लय में नजर आती हैं और अपने किरदार के साथ न्याय करती हैं. एक समय के बाद वह कहानी के केंद्र में आ जाती हैं और बाकी तमाम साथी कलाकारों पर भारी पड़ती हैं. उनकी कहानी में यहां कई परतें हैं और उनके खुलने की ही जिज्ञासा बनी रहती है. जबकि उनके बरक्स हुमा के किरदार का एक ही ट्रेक है. भले ही उन्होंने इसे यहां अच्छे से निभाया है लेकिन उनमें वह ऊर्जा और अभिनय की चमक गायब है, जो लैला और महारानी जैसी वेबसीरीजों में दिखाई दी थी. परमब्रत चटर्जी, रजित कपूर और समीर सोनी दोनों मुख्य नायिकाओं के सहायक के रूप में हैं.

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